बालक और उसका जीवन
मनुष्य एक बुद्धिमान प्राणी है। जब मनुष्य एक शिशु के रूप में जन्म लेता है तब उसने अन्नंत शक्तियां समाहित छिपी रहती है जिन्हे आवश्कता होती है निखारने की।
अगर शिशु का पालन पोषण अच्छे परिवेश में होता है तो वह बड़ा होकर अच्छी आदतें और अच्छे गुणों को अपनाएगा। अगर शिशु का पालन पोषण सभ्य समाज में नही होता है तो बालक बुराइयों के मार्ग पर अग्रसर हो जायेगा।
बालक का गुण उसके माता – पिता के गुणों का प्रभाव होता है,अगर बालक के माता–पिता सदकर्मो के मार्ग पे चलते है तो उनका संतान सदकर्मों का रास्ता अपनाएगा अगर बालक का परिवेश असभ्य क्यों न हो फिर भी उनके माता – पिता का गुण संयोजित रहेगा।
बालक का कुछ गुण आंतरिक विचारो से होता है,जो की माता – पिता से अलग होते है या तो वो गुण अच्छे हो सकते है या बुरे जो उसे उन्ही मार्ग की ओर अग्रसर करता जायेगा अगर बुरे गुण ज्यादा प्रभावी होता है तो वह बालक बुराई में तब्दील हो जाएगा जिसे उसका विनाश भी हो सकता है।

